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रु34 हजार करोड़, 17 बैंक कैसे किया DHFL ने सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला !

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अपडेटेड 26 सितंबर 2023, 5:41 PM IST
रु34 हजार करोड़, 17 बैंक कैसे किया DHFL ने सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला !
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देश में एक बार फिर से काफी बड़ा बैंक घोटाला सामने आया है। अगर कीमत के लिहाज से देखा जाए तो यह देश के इतिहास का सबसे बड़ा बैंक घोटाला भी हो सकता है। इस बैंक घोटाले में 17 बैंकों को करीब रु34,615 करोड़ का चूना लगाया गया है।

एक साल पहले पता चला था कि DHFL ने प्रधानमंत्री आवास योजना की मदद से गरीबों को घर देने के नाम पर सब्सिडी डकार ली। जी हां, इस प्राइवेट फाइनेंस कंपनी ने 80 हजार फर्जी अकाउंट खोले, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के फर्जी लोगों को खड़ा किया, उन्हें लोन दिया और सरकार से मिली रियायत खा गए। बैंकों ने दो किस्तों में करीब रु1900 करोड़ की छूट वधावन ब्रदर्स की कंपनी को ट्रांसफर कर दी। मतलब कागजों में बना गरीबों का घर और हकीकत में सब्सिडी पहुंच गई वधावन भाइयों के पास। इसे रु14 हजार करोड़ का घोटाला बताया गया। यस बैंक के साथ मिलकर भी DHFL ने अंदरखाने भारी उलटफेर किया है। पहले हम रु9,000 करोड़, रु14 हजार करोड़, रु23 हजार करोड़ को बड़ा घोटाला मानते गए लेकिन अब DHFL से ही जुड़ा रु34,615 करोड़ का घोटाला सामने आया है।

किसने किया यह घोटाला

देश के सबसे बड़े बैंक घोटाले के आरोप में दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन कपिल वधावन और डायरेक्टर धीरज वधावन और रियल्टी क्षेत्र की छह कंपनियों पर केस दर्ज किया गया है। इन पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले 17 बैंकों के समूह से रु34,615 करोड़ के फ्रॉड का आरोप लगा है।

कैसे सामने आया यह घोटाला

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत के आधार पर सीबीआई ने 11 फरवरी को कार्रवाई करना शुरू किया। मामला दर्ज होने के बाद सीबीआई 50 से भी ज्यादा अधिकारियों के साथ आरोपियों के मुंबई स्थित 12 ठिकानों की तलाशी ले रही है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने आरोप लगाया है कि, डीएचएफएल ने 2010 से 2018 के बीच अलग अलग काम के लिए 17 बैंकों के समूह से रु42,871 करोड़ का लोन लिया था। लेकिन बाद में 2019 से ही बैंक का लोन चुकाना बंद कर दिया। जिसके बाद बैंक ने कंपनी के खातों को एनपीए यानी गैर निष्पादित संपत्ति घोषित कर दिया। ऋण देने वाले बैंकों ने कंपनी के खातों को अलग-अलग समय पर एनपीए घोषित कर दिया। जनवरी, 2019 में जांच शुरू होने के बाद फरवरी, 2019 में बैंकों की समिति ने केपीएमजी को एक अप्रैल, 2015 से 31 दिसंबर, 2018 तक डीएचएफएल की विशेष समीक्षा ऑडिट करने के लिए नियुक्त किया था। ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया था कि डीएचएफएल प्रवर्तकों के साथ समानता रखने वाली 66 संस्थाओं को रु29,100.33 करोड़ दिए गए हैं। इनमें से रु29,849 करोड़ बकाया हैं। बैंक ने आरोप लगाया है कि बैंक से लिए गए पैसे को संस्थाओं और व्यक्तियों भूमि और संपत्तियों में निवेश किया है।

जेल में हैं वधावन ब्रदर्स

एक समय जिन वधावन ब्रदर्स का प्राइवेट सेक्टर में सिक्का चलता था, आज वे जेल की सलाखों के पीछे हैं। कपिल और धीरज वधावन को मई 2020 में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। वह केस यस बैंक फ्रॉड से जुड़ा था। पिरामल कैपिटल और हाउसिंग फाइनेंस (PCHF) ने रु34,250 करोड़ में डीएचएफएल का अधिग्रहण कर लिया है।

6 कंपनियां राडार पर

जांच एजेंसी ने पाया है कि दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन, तत्कालीन चेयरमैन और प्रबंध निदेशक कपिल वधावन, निदेशक धीरज वधावन और रियल्टी क्षेत्र की छह कंपनियां यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले बैंकों के समूह के साथ की गई धोखाधड़ी की साजिश में शामिल थीं। Sudhakar Shetty of Amaryllis Realtors समेत 6 रिएल्टर कंपनियां एजेंसी के रडार पर हैं। सीबीआई ने बैंक से 11 फरवरी, 2022 को मिली शिकायत के आधार पर यह कार्रवाई की है। इससे पहले 2021 में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने सीबीआई को डीएचएफएल के प्रमोटर्स और तत्कालीन प्रबंधन की जांच करने के लिए लिखा था। सीबीआई (CBI) ने इस मामले में DHFL, कपिल वाधवान, धीरज वाधवान, स्काईलार्क बिल्डकॉन प्रा. लिमिटेड, दर्शन डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, सिगटिया कंस्ट्रक्शन बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड, टाउनशिप डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, शिशिर रियलिटी प्राइवेट लिमिटेड, सनब्लिंक रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड, सुधाकर शेट्टी और अन्य को आरोपित बनाया है।

इस तरह के घोटालों से एक तरफ जहां राजस्व की घोर हानि होती है वहीं दूसरी तरफ लोगों का विश्वास कानून व्यवस्था और तंत्र पर shake होता है। लोगों में यह भावना घर कर रही है कि घोटालेबाज़ों का कुछ नहीं होगा। यह एक आम धारणा है कि ये घोटालेबाज अपनी money power एवं contacts का इस्तेमाल कर बच निकलेंगे। लोगों की इस धारणा को तोड़ना होगा। Example set करने होंगे।

घोटालेबाज़ों का राजनैतिक गठजोड़ भी एक बड़ी समस्या है। निष्पक्ष जांच नहीं हो पाती। Investigating Agencies पर political pressure डाला जाता है। कानून की दृष्टि में सभी बराबर हैं। लेकिन क्या हकीकत में ऐसा है। देश में appropriate legal remedy लेना सबसे महँगा है। घोटालेबाज़ों को कानून का कोई भय नहीं है।

सिर्फ कानून लाने या कानून बदलने से कुछ नहीं होगा। क़ानूनों को कठोरता से लागू किया जाना चाहिए। जांच time-bound manner में की जानी चाहिए। संपत्तीयां जब्त कर नीलामी होनी चहिएI Financial crime के मामले लंबे समय तक अदालतों में लंबित नहीं रहने चाहिए। इनका fast-track कोर्ट में priority से निपटारा होना चाहिए। जरा सोचिए! फैसला आप खुद कीजिये।

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