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रू36,000 करोड़ का PDS घोटाला नागरिक आपूर्ति निगम ‘नान घोटाला’ जांच सरकारो की खींच-तान मे उलझी

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अपडेटेड 25 सितंबर 2023, 5:29 PM IST
रू36,000 करोड़ का PDS घोटाला  नागरिक आपूर्ति निगम ‘नान घोटाला’ जांच सरकारो की खींच-तान मे उलझी
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छत्तीसगढ़ में रू36,000 करोड़ का कथित नागरिक आपूर्ति निगम यानी नान घोटाला फिर से चर्चा में आ गया है। विपक्ष में रहते हुए भूपेश बघेल ने नान घोटाला को एक बड़ा मुद्दा बनाया था। लेकिन अब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर ही इस कथित घोटाले के मुख्य अभियुक्त आईएएस अफ़सरों को बचाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में हुए राशन घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर चल रही जाँच के बाद सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि इस घोटाले की जाँच के लिए भूपेश बघेल के आदेश पर बनाई गई स्पेशल टास्क फ़ोर्स के सदस्यों, मुख्यमंत्री और एक बड़े क़ानून अधिकारी ने, इस घोटाले में नाम आने वाले दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कथित तौर पर मामले को कमज़ोर किया है।

इस गंभीर आरोप के बाद विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने भूपेश बघेल की सरकार पर चौतरफ़ा हमला बोला है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि भूपेश बघेल और कांग्रेस पार्टी, पत्र लिख कर जिस PDS घोटाले की सीबीआई जाँच और अभियुक्त अधिकारियों को गिरफ़्तार करने की माँग करते थे, आज वही भूपेश बघेल उन्हें बचाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं। रमन सिंह ने कहा, “मुझे यह समझ नहीं आता कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को बचाने में क्यों लगे हैं? यह मुख्यमंत्री और भ्रष्टाचारी अधिकारियों की सांठगांठ की ओर इशारा करता है।”

हालांकि इस मामले पर राज्य सरकार कोई भी टिप्पणी करने से बच रही है। राज्य के वरिष्ठ मंत्री और प्रवक्ता रवींद्र चौबे ने कहा कि वे इस पर कुछ भी टिप्पणी नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा, ” मुझे लगता है कि ये न्यायालय के अधीन मामला है और सरकार की ओर से कुछ अधिक बोलना ठीक नहीं है। किस दस्तावेज़ के आधार पर कौन क्या कह रहा है, इसमें बहुत ज़्यादा टिप्पणी नहीं की जा सकती।”

क्या है नान घोटाला

नागरिक आपूर्ति निगम राज्य भर में लाखों परिवारों को राशन बांटने का काम करती रही है। राज्य की आर्थिक अपराध शाखा यानी EOW और ACB ने 12 फ़रवरी 2015 को नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों के 28 ठिकानों पर एक साथ छापा मार कर करोड़ों रुपये बरामद किये थे।

इसके अलावा इस मामले में कथित भ्रष्टाचार से संबंधित कई दस्तावेज़, हार्ड डिस्क और डायरी भी एंटी करप्शन ब्यूरो ने ज़ब्त की थी। आर्थिक अपराध शाखा ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ में राइस मिलों से लाखों क्विंटल घटिया चावल लिया गया और इसके बदले करोड़ों रुपये की रिश्वतख़ोरी की गई। इसी तरह नागरिक आपूर्ति निगम के ट्रांसपोर्टेशन में भी भारी घोटाला किया गया। नमक की आपूर्ति में भी कथित भ्रष्टाचार किया गया।

इस मामले में आरंभिक तौर पर 27 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था। बाद में दो आईएएस अधिकारी, आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया गया। कथित घोटाले के दौरान दोनों अधिकारी क्रमश: नागरिक आपूर्ति निगम के प्रबंध निदेशक और चेयरमैन थे।

तब राज्य में विपक्षी दल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने आरोप लगाया था कि इस मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो और आर्थिक अपराध शाखा ने अभियुक्तों से एक डायरी भी बरामद की थी, जिसमें ‘सीएम मैडम’ समेत तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह के कई परिजनों के नाम कथित रुप से रिश्वत पाने वालों के तौर पर दर्ज थे। उन्होंने कहा था कि इस कथित डायरी के 107 पन्नों में विस्तार से सारा कथित लेन-देन दर्ज था, लेकिन एंटी करप्शन ब्यूरो और आर्थिक अपराध शाखा ने इस डायरी के केवल छह पन्नों का सुविधानुसार उपयोग किया। एंटी करप्शन ब्यूरो के तत्कालीन मुखिया मुकेश गुप्ता ने भी मीडिया में दिए गये अपने बयानों में माना था कि घोटाले के तार जहां तक पहुँचे हैं, वहां जाँच कर पाना उनके लिये संभव नहीं है.

इस मामले की जाँच चलती रही, कई अधिकारी सालों जेल में रहे। लेकिन रमन सिंह की सरकार ने हाईकोर्ट में एक हलफ़नामा दे कर दावा किया कि नागरिक आपूर्ति निगम में कोई घोटाला हुआ ही नहीं।

हालांकि निचली अदालत में तो यह मामला चलता ही रहा। इस घोटाले को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में हमर संगवारी ने 42/2015, सुदीप श्रीवास्तव ने 43/2015, वीरेंद्र पांडेय ने 44/2015 और वशिष्ठ नारायण मिश्रा ने 57/2015 जनहित याचिका भी दायर की। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा और अदालत ने इसकी समयबद्ध सुनवाई के निर्देश भी दिए, लेकिन मामला अपनी रफ़्तार से चलता रहा।

इस दौरान ही कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के बतौर भूपेश बघेल ने दोनों आईएएस अधिकारियों अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला के ख़िलाफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को पत्र लिखा।

यह भी दिलचस्प है कि कथित घोटाले के अभियुक्त दोनों आईएएस अधिकारियों अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला के ख़िलाफ़ 17 जुलाई 2015 को राज्य शासन द्वारा और चार जुलाई 2016 को केंद्र सरकार द्वारा अभियोजन स्वीकृति दी गई, लेकिन सालों तक दोनों के ख़िलाफ़ अभियोग पत्र पेश नहीं किया गया। ऐन विधानसभा चुनाव के बाद लेकिन चुनाव परिणाम से पहले, 29 नवंबर 2018 को दोनों अभियुक्तों के ख़िलाफ़ अभियोग पत्र पेश किया गया।

जाँच अधिकारी ही निलंबित

विधानसभा चुनाव के परिणाम आये और 15 सालों से सत्ता में रही भारतीय जनता पार्टी की विदाई हो गई। 17 दिसंबर 2018 को भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और कुछ दिनों बाद ही नान घोटाले की एसआईटी जाँच की घोषणा की गई। हालांकि हाईकोर्ट ने ऐसी किसी जाँच पर रोक लगा दी लेकिन इस दौरान कई दिलचस्प घटनाक्रम सामने आए।

पूरे नान घोटाले में छापामारी और जाँच करने वाले आर्थिक अपराध शाखा के मुखिया रहे विशेष पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता और आर्थिक अपराध शाखा के ही दूसरे आईपीएस रजनेश सिंह को ही नौ फ़रवरी 2019 को निलंबित कर दिया गया। इनके ख़िलाफ़ आरोप लगाया गया कि ये दोनों अफ़सर नान घोटाले की जाँच के दौरान अवैध रूप से नेताओं-अफ़सरों के फ़ोन टैप करवा रहे थे और झूठे दस्तावेज़ तैयार कर षडयंत्र रच रहे थे।

इसके उलट नान घोटाले के अभियुक्त जिन दोनों आईएएस अधिकारियों अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला के ख़िलाफ़ भूपेश बघेल और पूरी कांग्रेस पार्टी मोर्चा खोल कर बैठी थी, वही दोनों आईएएस अधिकारी भूपेश बघेल की सरकार में सबसे ताक़तवर बन कर उभरे।

उद्योग विभाग के संचालक के पद पर कार्यरत अनिल टुटेजा के बारे में तो कहा गया कि मुख्यमंत्री की उप-सचिव सौम्या चौरसिया के साथ मिल कर वे, सरकार के सारे फ़ैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

इस बीच प्रवर्तन निदेशालय द्वारा नान घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग का एक मामला जनवरी, 2019 को दर्ज किया गया और 27 फ़रवरी 2020 को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की उप-सचिव सौम्या चौरसिया समेत बघेल के कई क़रीबी अधिकारियों और नेताओं के घर आयकर विभाग ने छापामारी की।

वित्त मंत्रालय की 2 मार्च, 2020 की एक प्रेस विज्ञप्ति कहती है, “आयकर विभाग ने रायपुर में 27 फ़रवरी, 2020 को कुछ लोगों के समूह, हवाला डीलरों और उद्योगपतियों पर जाँच बिठाई. जाँच के दौरान अवैध कामों से जुड़े दस्तावेज़ और इलेक्ट्रॉनिक सामान ज़ब्त किये गये जिनसे पता चलता है कि सरकारी अधिकारियों और अन्य लोगों को हर महीने बड़ी रक़म अदा की जाती थी।

इसके अलावा, बिना किसी अकाउंट धारक के ख़रीद-बेच, कर्मचारियों के नाम पर बनाये गए बैंक अकाउंट्स से करोड़ों के लेन-देन और बिना खाताधारक का एक अकाउंट मिला है। बेनामी गाड़ियों की डिटेल्स, हवाला लेन-देन, कोलकाता की कम्पनियों को भुगतान और बहुत बड़े लैंड बैंक (बहुत सारी ज़मीन खरीद कर रखना) समेत शेल कंपनियों की जानकारी मिली है। इस जाँच के दौरान भारी मात्रा में नक़दी बरामद की गयी है. अब तक 150 करोड़ रुपये का बेनामी लेन-देन सामने आया है और आगे जाँच में मिले सबूत की पड़ताल के बाद इसके और बढ़ने की संभावनाएं हैं.”

मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में अगस्त 2020 को दोनों आईएएस अधिकारियों अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला को हाईकोर्ट से ज़मानत भी मिल गई। इस बीच आलोक शुक्ला 30 मई 2020 को सेवानिवृत्त हो गये लेकिन इस सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें तीन साल के लिए प्रमुख सचिव के पद पर संविदा नियुक्ति दे दी गई। आज की तारीख़ में वे स्कूल शिक्षा विभाग, संसदीय कार्य, तकनीकी शिक्षा, रोज़गार, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, चिकित्सा शिक्षा जैसे राज्य के महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख सचिव की कमान संभाले हुए हैं। इसके अतिरिक्त उनके पास छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल के अध्यक्ष का भी उत्तरदायित्व है।

निशाने पर बघेल सरकार

अब प्रवर्तन निदेशालय ने फ़रवरी 2020 में आयकर विभाग की छापेमारी के दौरान एकत्र किए गये कुछ सबूत और बातचीत के ट्रांस्क्रिप्शन सिलबंद लिफ़ाफ़े में सुप्रीम कोर्ट में सौंपे हैं। प्रवर्तन निदेशालय के हलफ़नामे में कहा गया है कि इस ट्रांसक्रिप्ट मैसेज से साफ़ है कि नान घोटाले में छत्तीसगढ़ में सत्ता का दुरुपयोग किया गया है, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की गई है, गवाहों को प्रभावित किया गया है। स्पेशल टास्क फ़ोर्स के सदस्यों, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और एक बड़े क़ानून अधिकारी का हवाला देते हुए कहा गया है कि इन सभी लोगों ने मिल कर नान घोटाले की जाँच को कमज़ोर किया है। प्रवर्तन निदेशालय ने आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा की ज़मानत भी रद्द करने की माँग की है।

पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं, “ऐसे अधिकारियों को संरक्षण देना प्रदेश की जनता और जनादेश का अपमान है. उन्हें तत्काल बर्ख़ास्त कर जाँच एजेंसी को निष्पक्ष जाँच करने हेतु स्वतंत्रता देनी चाहिए।”

लेकिन कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता और संचार विभाग के प्रमुख शैलेष नितिन त्रिवेदी इन तमाम स्थितियों के लिए रमन सिंह को ही ज़िम्मेदार बता रहे हैं। उन्होंने कहा कि नान मामले की पूरी जाँच रमन सिंह के कार्यकाल में हुई और अगर आज रमन सिंह, सरकार जाने के तीन साल बाद यह कह रहे हैं कि केस कमज़ोर हुआ है तो स्वयं तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में उनको इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।

रमन सिंह पर आरोप लगाते हुए शैलेष नितिन त्रिवेदी का कहना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने के बाद, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एसआईटी गठित की थी ताकि नान के जो तथ्य उजागर नहीं हुए हैं और जिन्हें रमन सिंह की सरकार में छुपाया गया उन्हें सामने लाया जा सके. लेकिन भाजपा नेताओं ने न्यायालय में याचिका दायर करके जाँच को रुकवा दिया।

शैलेष नितिन त्रिवेदी कहते हैं, “रु36 हज़ार करोड़ का नान घोटाला, 20 लाख फ़र्ज़ी राशन कार्ड से ग़रीबों के राशन में घोटाला और रमन सिंह चाउर वाले बाबा बनते थे। उन्होंने रू36 हज़ार करोड़ का नान घोटाला कैसे होने दिया और इस केस को कमज़ोर कैसे होने दिया, इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करें।”

हालांकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते का कहना है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन भले हो गया हो, लेकिन राज्य की नीतियां या प्रशासनिक ढांचे में कोई बदलाव नहीं हुआ है और भ्रष्टाचार के वही अभियुक्त अफ़सर सरकार के खेवनहार बने हुए हैं। पराते का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी में केवल नूरा कुश्ती चल रही है। संजय पराते कहते हैं, “विपक्ष में रहते हुए भ्रष्टाचार के जिन मुद्दों पर कांग्रेस हंगामा करती थी, सत्ता में आने के बाद उनमें से एक भी मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई। सत्ता के संरक्षण के बिना कोई भी भ्रष्टाचार नहीं होता और कांग्रेस सरकार जानती है कि अगर अफ़सरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई तो मामला नेताओं तक भी पहुँचेगा। ऐसे में कांग्रेस अफ़सरों को भी बचाना चाहती है और भाजपा के नेताओं को भी।”

फिर आम आदमी को छला जा रहा है व उसके हक़ को मारा जा रहा है। क्यों करती है सभी सरकारे एक सा बर्ताव? क्या सरकारो का सिर्फ चेहरा अलग होता है और जनता से जुड़े मुद्दो पर सभी सरकारो का व्यवहार समान होता है? क्यों जनता का हक़ छीनकर कुछ लोगो का फायदा पाहुचाया जाता है? क्यों सरकार, प्रशासन, कानून व न्याय व्यवस्था सभी जनता को छलती रहती है? क्यों नहीं है कानून के रखवालों के नज़र मे सब बराबर? जरा सोचिए, फैसला आप खुद कीजिये!

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